जलालत के द्वार पर, मारा हुआ आदमी ,
होश हवास न बाकी, मधु का मारा हुआ आदमी ।
शोहबते हुस्न में खोया हुआ था ,
पाक मुहब्बत पिरोया हुआ था ।
गर्दिश-ए-वक्त ने ढाया सितम,
ठोकर-ए-इश्क ने दिया लाखो ग़म,
ग़म हो कुछ कम,
हाला का मारा हुआ आदमी ॥
पारो के बाद चन्द्रमुखी है आयी ,
मदिरा संग - संग शनासायी ।
इति हुअा कुछ वर्षों का दौर,
चुभने लगी, चन्द्रमुखी की प्यारी सी ठौर ।
भाग सका न भाग ही पाया,
जीवन से भागा हुआ आदमी ।।
ज़हन के किसी कोने में, पारो है बाकी,
जाना तो पड़ेगा, अब जाने दे साक़ी ।
राह गुजरा, संगी साथी गुजारे,
पहुँच ही गया, इश्क देवी के द्वारे ।
मुक्त हुआ बेबस बावला,
निष्प्राण पड़ा, हारा हुआ आदमी ।
जलालत के द्वार पर, मारा हुआ आदमी ॥
विजय सिंह " सन्त "
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