कभी इश्क़ इत्फ़ाकन किया करता था ,
अभी इश्क़ एहतियातन किया करता हूँ ;
कभी हद से गुजर जाया करता था ,
अभी हद में रहता हूँ तो भी डरता हूँ .!!
ऎ तबीबो खुद की बहुत सुनी ,
कभी इसकी रुनी, कभी उसकी धुनी ;
दमाग़दारों के शहर में ,
दिल हाथ लिये फिरता रहता हूँ ..!!
साक़ी तेरी रौशन महफ़िल में ,
रौनक रहती हर वक्त सही ;
कुछ घूंट सुरा का बाकी है ,
फिर चल संग मेरे अौर कहीं !
वादाफ़रोश - जहाँ में ,
साथ न छोड़ू , वादा करता हूँ ..!!
हुस्न की देवी, " सन्त " सलाम ,
तू है ललाम, मैं तेरा हमाम ..;
मेरी राह पे तो कदम बढा ,
हर काम मुक्क़मिल करता हूँ ..!!
विजय सिंह " सन्त "