शनिवार, 12 सितंबर 2015

हास्य कविता

मैं समझा भरा है प्याला,
पर ये तो खाली है  !
थोड़े में ज्यादा क्या बतलाऊँ,
जैसे मेरी घर वाली है  !!
पी के आया रात,
किल्ली खट - खट ,खट- खट खटकाया ,
दरवाजा जब खुला नहीं तो,
शेरों जैसा गुर्राया,
खुला फटाका ,गिरा सटाका,
मचा रही है शोर ,पकड़ लो चोर
गज़ब की साली है !
मैं समझा भरा है प्याला, पर ये तो खाली है !!
मदिरालय में शोर हो रहा,
किसने पी ली मेरी शराब ,
किसने खाया चिखना मेरा ,
किसने ले ली मेरी हिसाब. !
मदिरालय के फुटपाथ पर पड़ा रहा सारी रात,
न कोई साथ, बगल में नाली है !
मैं समझा भरा है प्याला, पर ये तो खाली है !!
भेद न रहता इसको पीने से,
सब संगी साथी बन जाते,
हंसते गाते, ढोल बजाते,
मधुशाला के मधु चट जाते  !
साक़ी बाला ने दिया जो हाला,
" सन्त " चढाया कन्ठ,
बजाइ ताली है  !
मैं समझा भरा है प्याला, पर ये तो खाली है !!
थोड़े में ज्यादा क्या बतलाऊं,
जैसे मेरी घर वाली है  !!
😀😀😀😀😜😜😜

  विजय सिंह " सन्त "

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें