😁 पोशीदा मुहब्बत दरक गयी,
हवस के दरमयान ;
मैं शीशा बन के रह गया,
पत्थर के दरमयान ;
शनासायी बहुत हुयी,
रिंदों की दुनियां में
जो अफ़जल था वो फ़रक गया,
बावफा के दरमयान ॥
विजय सिंह " सन्त "
मैं तो सीधा अौर बेबाक लिखता हूँ,
कभी तरन्नुम तो कभी अल्फ़ाज लिखता हूँ ;
लोग शायरी या नज़्म लिखते होगें ,
मैं तो दिल से जज़्बात लिखता हूँ ।
विजय सिंह " सन्त "
घबरायें वे जिन्हें महफिल में अकेले होने का एहसास होता है,
चिंता वे करें जो खब़रनवीसों का मोहताज होता है ;
ऎ दिल तू तो साथ है अौर साथ देना मेरा,
हम तो वे परिंदे है जिनके सर खुदा का हाथ होता है ॥
विजय सिंह " सन्त "
मुझे भी अंदाजा है पानी के बहाव का,
कितना गुजर गया ,
कितना गुजरने वाला है ;
समुन्दर की गहराई को भी समझे मेरे दोस्त ..!
सब तो वहीं जाने वाला है ॥
विजय सिंह " सन्त"
तमन्ना है दूर तलक जाने कि,
कोई साथ दे, या न दे ,
मेरी ख़्वाहिश है दिल लगाने की,
कोई साथ दे, या न दे ;
ऎ तंग दिल क्यूं है चिलमन से देखता,
नजदीक आ देख तो ले,
फिर साथ दे, या न दे ॥
विजय सिंह " सन्त "
अब कौन जलाता चराग़ अपने शहर में,
अब कौन दिखाता राह, सूने रहगुजर में,
अन्धेरों को आस थी , रौशन होंगी बस्तियां ,
बादशाह है अन्धे , अब अपने वतन में ॥
विजय सिंह " सन्त "
मुहब्बत है, तो बहानें क्यूं हैं,
दिल हमारे फिर तुम्हारे क्यूं हैं,
सिमट जाओ, आओ आगोश में,
आकाश में चाँद - तारे ज्यूं हैं ॥ " सन्त "
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